A digital suggestion to end the corruption and black money that have been hollowing India for centuries.
देश एक बहुमुखी विकासशील देश है। यहाँ ऊर्जा की खपत बहुत ज्यादा है साथ ही साथ इतनी बड़ी आबादी को भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा मुहैया कराना किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में छोटी छोटी बचत देश की उन्नति में सहायक हो सकती है। आइये जानने की कोशिश करते हैं कि कैसे भारतीय मुद्रा यानि रुपया से ही अरबों रुपया हर साल बच सकता है। ये एक परिकल्पना है जो सिर्फ तर्क और सुझाव द्वारा ही सार्थक सिद्ध हो सकती है।
पहले देखते है कि भारतीय मुद्रा रुपया के जन्म से लेकर चलन तक कहाँ कहाँ खर्च आता है-
1- जैसा कि आप सभी को मालूम है कि भारतीय मुद्रा रुपया को सुरक्षा के लिहाज से हर साल बदलाव करने पड़ते है. शुरुआत यहीं से होती है पहले खर्च की।
2- दूसरे इसकी छपाई पर हर साल करोड़ों रूपये खर्च होता है. 2000 रुपये का एक नोट छापने में 3.53 पैसे, 500 रुपये के नोट को छापने में 2.13 पैसे का, 200 रुपये के नोट को छापने में 2.15 पैसे का, 10 रुपये के नोट छापने में 1.01 रुपये, 20 रुपये के नोट छापने में 1 रुपये, 50 रुपये के नोट छापने में 1.01 रुपये और 100 रुपये के नोट छापने में 1.51 पैसे का खर्च होता है।
3- छापे हुए नोटों की गतिमान सुरक्षा यानी टकसाल या प्रिंटिंग प्रेस से लेकर बैंक और एटीएम तक पहुँचने को लेकर करोड़ों रूपये हर साल खर्च बैठता है।
4- गले और ख़राब हुए नोटों और सिक्कों का निपटान भी काफी खर्चीला है।
5- बाजार में चल रहे इन नोटों या सिक्कों का चलन से कभी कभी भी बाहर हो जाना भी आम जनता की एक समस्या का कारण बनता है जैसा कि 2016 में 500 और 1000 रूपये के नोट बंद होने से लोगों में बदहवासी आ गयी थी और 1 रूपये के छोटे सिक्को को लेने से भी इंकार किया जाता रहा है।
6- आतंकी देशों और भारत के विकास की राह में रोड़ा अटकाने वाले प्रतिस्पर्धी देश नकली नोटों और सिक्कों को भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के उद्देश्य से बाजार में चलाये जाने की भी ख़बरों से भी आप बेखबर नहीं हैं।
7- साथ ही बैंक और ATM में cash की लेन देन व सुरक्षा में भी काफी खर्च बैठता है।
8- भौतिक मुद्रा का एक खतरनाक रूप भ्रष्टाचार और कालेधन का बढ़ावा भी है जो किसी भी देश के लिए विष के सामान है।
आइये अब समझने की कोशिश करते हैं कि भारतीय मुद्रा को डिजिटली बनाकर कैसे इन सारे खर्चों से बचा जा सकता है।-
भारतीय मुद्रा रुपया पूर्णतया डिजिटल हो जाने से उपरोक्त किसी भी प्रकार से कोई खर्च नहीं आएगा बल्कि समय और उसकी सुरक्षा में आने वाला खर्च भी ख़त्म हो जायेगा। आज हम UPI, Internet Banking और Cards पैसों का लेन देन करना सीख गए हैं और इसमें कोई नयी बात नहीं है। अगर कोई नयी बात होगी तो वो ये कि हमें कभी बैंक जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। किसी भी लेन देन का ट्रैक रिकॉर्ड सरकार के पास हमेशा मौजूद रहेगा। कोई भी व्यक्ति ऊपरी आमदनी जिसे कालाधन कहा जाता है उसे इक्कट्ठा नहीं कर पायेगा जो कि भौतिक मुद्रा के सापेक्ष होता है। कोई फ़र्ज़ी ITR नहीं फाइल कर पायेगा। लेने वाला और देने वाला हमेशा सरकार की निगाह में रहेंगे। आतंकवादी या कोई ऐसा प्रतिस्पर्धी देश भारतीय अर्थव्यस्था को कमजोर करने के लिए नकली करेंसी चला ही नहीं पायेगा। सारे पैसों का लेखा जोखा एक पैन कार्ड या आधार से एक क्लिक में जाना जा सकेगा। बैंक में भीड़भाड़ लगभग ख़त्म हो जाएगी जरूरी सेवाओं के लिए ही केवल लोग बैंक जाया करेंगे। एटीएम का खर्चा तो बिलकुल ही ख़त्म हो जायेगा।
जिस तरह किसी दवाई का फायदा तो होता है मगर उसके पीछे साइड इफेक्ट्स भी होते हैं वैसे ही कुछ बातों का अगर ध्यान दिया जाय तो ये भी कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है जैसे भौतिक मुद्रा के डिज़ाइन और प्रिंटिंग से जुड़े लोग व प्रेस ख़त्म हो जायेंगे। बैंक में कैशियर की सेवा समाप्त हो जाएगी। बैंक और एटीएम तक कैश ले जाने वाली वैन और सुरक्षा में लगे लोगों की सेवा ख़त्म हो जाएगी। साइबर सिक्योरिटी में बढ़ोत्तरी से डिजिटल करेंसी को कोई भी नुक्सान नहीं पहुंचा पायेगा।
इस प्रकार हम इस नयी चुनौती को अवसर में बदल दें तो हमारा देश भ्रष्टाचार, काले धन, साइबर अटैक, नकली नोट, बैंक एटीएम में आने वाले खर्चों से बचकर दुनियाँ को दिखा सकते हैं कि हम में विश्वगुरु बनने की काबिलियत वाक़ई है। और ये करने की हिम्मत केवल भारत जैसे संवेदनशील और बहुमुखी प्रतिभा के धनी लोग ही कर पाते हैं। साथ ही साथ हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि भारत में एक बहुत बड़ी आबादी अशिक्षित है अतएव ऐसी व्यवस्था लागू करने से पहले अपने नागरिकों को जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है।