सच्चा देशभक्त पटाखों का इतिहास जानकर कभी भी नहीं जलाएगा, जानिए क्या है इसका इतिहास!

सच्चा देशभक्त पटाखों का इतिहास जानकर कभी भी नहीं जलाएगा, जानिए क्या है इसका इतिहास!


The true patriot will never burn knowing the history of firecrackers, know what is its history!

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हिन्दू बाहुल्य इस देश में कभी शायद ही किसी बुद्धिजीवी ने ये जानने की कोशिश की हो कि- “दीपावली पर आतिशबाजी करना कब और कैसे शुरू हुआ और क्यों? क्या दीपावली पर आतिशबाजी करना पौराणिक काल से ही जुड़ा हुआ है?”

भारत में जब भी वायु या ध्वनि प्रदुषण की बात उठती है तो सबसे पहले आतिशबाज़ी पर ही प्रतिबन्ध लगता है, ऐसे में लोग भी कहने लगते हैं कि दिवाली में पटाखे फोड़ने से रोकना हिंदू संस्कृति पर हमला है साथ ही होली के समय ये भी सुनने में आता है कि पानी से रंग खेलने से मना करना हिन्दू संस्कृति पर प्रहार है।जबकि सच्चाई इसके उलट है।

हमारे देश में पटाखे कब कब छुड़ाए जाते हैं इसकी भी कई मान्यताएं प्रचलित हैं-

1- महाभारत के अनुसार पांडवों के 12 साल के वनवास और एक साल के अज्ञातवास से लौटने का प्रतीक है।दिवाली।

2- असुर और देवों के बीच समुद्र मंथन के बाद देवी लक्ष्मी के रूप में दिवाली मनाई जाती है. इसके पांच दिन बाद देवी लक्ष्मी की भगवान विष्णु से शादी का जश्न मनाया जाता है. इसके साथ ही भगवान गणेश, मां सरस्वती और कुबेर की भी पूजा की जाती है ताकि घर में सुख, समृद्धि, संकटों से मुक्ति और ज्ञान की वर्षा हो।

3- पूर्वी भारत खासकर बंगाल, ओडीसा और असम में दिवाली, काली पूजा के रुप में मनाई जाती है।

4- मथुरा में दिवाली भगवान कृष्ण को याद कर मनाई जाती है।

5- दक्षिण भारत में केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में भगवान कृष्ण द्वारा नारकासुर के वध के उपलक्ष्य में दिवाली मनाई जाती है.

भारत मे सबसे ज्यादा पटाखों का उत्पादन तमिलनाडु राज्य के शिवकाशी शहर मे होता है . शिवकाशी को Capital of indian firecrackers भी कहा जाता है , क्योकी भारत का 55% पटाखा उत्पादन शिवकाशी से ही होता है।

पटाख़ों का आविष्कार चीन में हुआ। दरअसल पटाखों का आविष्कार एक दुर्घटना के कारण चीन में हुआ। मसालेदार खाना बनाते समय एक रसोइए ने गलती से साल्टपीटर (पोटैशियम नाईट्रेट) आग पर डाल दिया। इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं, जिस से लोगों की उत्सुकता बढ़ी। फिर रसोइए के प्रधान ने साल्टपीटर के साथ कोयले व सल्फर का मिश्रण आग के हवाले कर दिया, जिससे काफी तेज़ आवाज़ के साथ रंगीन लपटें उठी। बस, यहीं से आतिशबाज़ी यानी पटाखों की शुरुआत हुई। इतिहास में पटाखों का पहला प्रमाण वर्ष 1040 में मिलता है, जब चीनियों ने इन तीन चीज़ों के साथ कुछ और रसायन मिलाते हुए कागज़ में लपेट कर ‘फायर पिल’ बनाई थी।

पटाखे जलाना भारत की परंपरा नहीं है! पटाखों का आविष्कार सातवीं शताब्दी में चीन में हुआ था।इसके बाद तक 1200 ईस्वी से 1700 ईस्वी तक ये पूरे विश्व में लोगों की पसंद बन गए. यही नहीं गन पाउडर की खोज पर इस दौरान कई किताबें भी लिखी गई हैं.

पटाखों के इतिहास में क्रांतिकारी बदलाव बारूद के आने से हुआ। सन् 1270 के बाद से बारूद ने पटाखों को नया स्वरूप दिया। सीरिया के रसायनशास्त्री अल रम्माह ने सबसे पहले बारूद को लेकर प्रयोग किया था।

मुगलों ने जब भारत पर हमला किया तो वो अपने साथ बारुद भी लाए थे। इस बारूद से वो बम बनाते थे और भारतीय सेनाओं पर हमला करते थे। बाद में मुगल और कुछ भारतीय राजा जश्न मनाने के लिए घातक बारूद के बम से धमाका करने लगे। उन दिनों बम या बंदूक से फायर करना रसूखदारों के जश्न में शामिल हुआ। ज्यादातर मुगला और उनके मित्र राजाओं ने इसे अपनी परंपरा बनाया।


भारत में सबसे पहले सन् 1526 में काबुल के सुल्तान बाबर ने भारत में हमले के दौरान किया था। कहते हैं बाबर की भारत विजय की अहम वजह बारूद ही थी। बारूद भरे तोपों की गरज के आगे भारतीय लड़ाके ठहर नहीं सके और इस तरह मुगलों का इतिहास शुरू हुआ। बाद में बारूद को और शुद्ध किया जाने लगा। जिससे इसकी धमक और रौशनी और तेज हुई।

दीपावली जैसे त्योहार से पटाखों या आतिशबाजी का कोई रिश्ता नहीं है। दिवाली में पटाखे जलाने की परंपरा तो बहुत बाद में शुरू हुई है. मूलत: दीपावली हिंदू धर्म का ठीक वैसा ही त्यौहार है जैसे कि महाशिवरात्रि या अन्य त्यौहार। शास्त्रों में लिखा है कि इस दिन समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए एवं आमंत्रित करने के लिए दीपावली पर विधिवत पूजा एवं यज्ञ हवन का विधान है। कथाओं के अनुसार 5000 साल पहले भगवान श्रीराम लंका में रावण का वध करके इसी दिन वापस आए थे। उनके स्वागत में लोगों ने घी के दीपक जलाए। तब से दीपावली के दिन दीपक जलाने की परंपरा आई। अंग्रेजी शासनकाल में चूंकि वो उत्सव मनाने के लिए आतिशबाजी चलाते थे इसलिए भारतीयों ने भी ऐसा करना शुरू कर दिया। पहले राजा और धनाढ्य लोग चलाते थे अब आम नागरिक भी चलाने लगे हैं। हालात यह है कि कुछ लोग आतिशबाजी को ही लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने का जरिया मानते हैं। जबकि जाने अनजाने मनुष्य अपनी जीवन क्षमता को काम करने में ही योगदान दे रहा है।

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