मोटर-गाड़ी बंद, कारखाने बंद, लोग अपने घरों में बंद फिर भी क्यों बढ़ रहा ओजोन में छेद??

मोटर-गाड़ी बंद, कारखाने बंद, लोग अपने घरों में बंद फिर भी क्यों बढ़ रहा ओजोन में छेद??

Motor-vehicle shut down, factory closed, people closed in their homes, yet why is the hole in ozone still increasing??

#EarthDay #OzoneLayer #CFCGases

दुनियाँ एक तरफ जहाँ कोरोना वायरस की महामारी के चलते लॉकडाउन की स्थिति बानी हुयी है, वहीँ आर्कटिक के ऊपर ओजोन लेयर में विशाल छिद्र ने वैज्ञानिकों को चिंता में डाल दिया है। आर्यभटट् प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिकों के अनुसार शीत ऋतु में इस बार अत्यधिक ठंड पड़ने व हैलोजन गैसों के उत्सर्जन के कारण ओजोन लेयर में विशाल छिद्र बन गया है। इस छिद्र का दायरा 10 लाख वर्ग किमी से भी ज्यादा है। इनका आकार भी 2.0 से 2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर तक हो सकता है और तीन से चार महीने तक रह सकता है। आपको बताते चलें कि ओजोन की परत इंसानों में कैंसर पैदा करने वाली सूरज की पराबैंगनी किरणों को भी रोकती है।

एरीज के वायुमंडलीय प्रभाग के अध्यक्ष डॉ. मनीष नाजा के अनुसार, ओजोन में यह होल मध्य मार्च में बना है। इसके पीछे मुख्यत: दो कारण हैं। पहला, इस बार भयंकर ठंड पड़ी, जिससे तापमान माइनस 80 डिग्री सेल्सियस से नीचे पहुंच गया था, जिससे ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाली खतरनाक हैलोजन गैस उच्च आसमान के बादलों में फंसकर रह गईं। बादलों का यह क्षेत्र आसमान में करीब 20 किमी की उंचाई पर होता है, जहां गैस कैद होकर रह जाती है। मगर जब तापमान बढ़ता है तो बादलों का बिखराव शुरू हो जाता है, जिससे गैसें बाहर निकलने लगती हैं। इन गैसों के उत्सर्जन से ओजोन लेयर में छेद होने लगता है।

असल में धरती के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के पास के वातावरण से हर साल ओजोन की मात्रा घटती है। इसका कारण वहां का बेहद कम तापमान होता है जिसके चलते ध्रुवों के ऊपर के बादल आपस में चिपक कर एक बड़ा पिंड बना लेते हैं। उद्योग धंधों से निकलने वाली क्लोरीन और ब्रोमीन जैसी गैसों की इन बादलों से मिलकर ऐसी प्रतिक्रिया होती है जिसके कारण वहां स्थिति ओजोन परत का क्षरण होने लगता है।

वैज्ञानिकों ने 1970 के दशक में चेतावनी दी थी कि पृथ्वी के ऊपर मौजूद ओजोन परत लगातार पतली होती जा रही है। अंटार्कटिक के ऊपर मौजूद छेद का पता 1985 में चला था। 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत ज्यादातर देशों ने क्लोरोफ्लोरो कार्बन पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसका इस्तेमाल कूलिंग के लिए किया जाता था। CFC क्लोरीन गैस में बदलकर ओजोन को रासायनिक रूप से तोड़ता है। इसका अच्छा असर अब ओजोन परत पर दिखाई पड़ रहा है। रेक्स का कहना है, “अगर ये रेगुलेशन नहीं होते तो इस साल के हालात और भी बुरे होते।”

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा इसके छिद्र की भरपाई होगी। पहले वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि ओजोन परत इस सदी के मध्य तक पूरी तरह ठीक हो सकती है। मगर हम मनुष्य इस धरती पर सिर्फ तबाही ही मचा रहे हैं क्यूंकि इस प्रकृति से जितना लेते हैं उसे उतना भी वापिस करने की भी कोशिश नहीं करते।

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