Special on Hindi Journalism Day : When was the first ban on journalism?
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भारत में पत्रकारिता का इतिहास बहुत ही उपेक्षा पूर्ण रहा है अगर हम इतिहास को देखें तो पाएंगे कि अंग्रेजी शासकों ने पत्रकारों को दबाने का बहुत प्रयास किये थे अंग्रेजी हुक्मरानो ने पत्रकारों कि आवाज दबाने के लिए भारतीय प्रेस पर तरह तरह के एक्ट पारित किये अंग्रेजों को सबसे ज्यादा तकलीफ हिंदी में प्रकाशित समाचार पत्रों से होती थी। अंग्रेजी शासन काल में प्रेस पर क़ानूनी नियंत्रण की शुरुआत सबसे पहले तब हुई जब लॉर्ड वेलेजली ने प्रेस नियंत्रण अधिनियम द्धारा सभी समाचार- पत्रों पर नियंत्रण (सेंसर) लगा दिया। इसे प्रेस नियंत्रण अधिनियम,1799 के नाम से जाना जाता है।
गवर्नर जरनल जॉन एडम्स ने सन् 1823 में भारतीय प्रैस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया इस नियम के अनुसार मुद्रक तथा प्रकाशक को मुद्रणालय स्थापना करने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था जिस कारण से राजा राम मोहन रॉय को अपनी पत्रिका ‘मिरात-उल-अख़बार’ का प्रकाशन बंद करना पड़ा।
सर्क्युलर प्रेस एक्ट,1878: लॉर्ड लिटन ने सर्क्युलर प्रैस एक्ट लागू किया इस एक्ट के प्रमुख प्रावधान थे-
1. प्रत्येक प्रैस को यह लिखित वचन देना होगा कि वह (अंग्रेजी) सरकार के विरुद्ध कोई लेख नहीं छापेगा।
2. प्रत्येक मुद्रक तथा प्रकाशक के लिए जमानत राशि जमा करना आवश्यक होगा।
3. इस संबंध में जिला मजिस्ट्रेट का निर्णय अंतिम होगा तथा उसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकेगी।
ये कुछ ऐसे एक्ट थे जिनका मुख्य उद्देश्य भारतीय प्रेस को पूर्ण रूप से मौन करना था। आजादी के बाद सन 1966 में भारतीय प्रेस परिषद् कि स्थापना हुई जिसका उद्देश्य भारत में प्रैस के मानकों को बनाए रखने और सुधार की स्वतंत्रता का संरक्षण है, लेकिन भारत में इमेरजंसी के दौरान एक बार फिर से पत्रकारिता को काले दिन देखने पड़े। सरकारी तानाशाही के चलते बहुत से समाचारों पत्रों ने दम तोड़ दिया फ़िलहाल किसी तरह से पत्रकारिता ने खुद को संभाला और तमाम सरकारी और काॅरपोरेट दबाव के बावजूद भी पत्रकारों ने पत्रकारिता के वजूद को जिन्दा रखा। इस दौरान टीवी का युग आया और फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जन्म हुआ शुरुआत में इलेक्ट्रिक मीडिया को भी तरह तरह कि उपेक्षाएँ सहनी झूलनी पड़ीं लेकिन धीरे धीरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रिंट मीडिया को पीछे छोड़ दिया।

