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देश के अधपके और रोजाना बदलते रहने वाले कानूनों से विदेशी हाथों बिक रही देशी कंपनियां

Domestic companies being sold to foreign hands
Domestic companies being sold to foreign hands due to the under-cooked and changing laws of the country.

हमारा देश दुनिया के सबसे बड़ी आबादी वाला देश है जो इसे दुनियाँ के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार भी बनाता है। यहाँ हर तरह का माल खपाया जा सकता है यही सोचकर विदेशी कम्पनियाँ सदियों से काफी मोटा मुनाफा वसूली करती रही हैं और टैक्स देने की बारी आने पर आनाकानी करना।

आज के परिदृश्य में भारत सरकार हो या कोई राज्य सरकार इन जैसी मुनाफाखोर कंपनियों को देश में अपना व्यवसाय चलाने के लिए उन्हें तरह तरह से लुभाने में लगी रहती हैं, जबकि उसका एक लम्बे समय बाद देशवासियों को काफी नुक्सान उठाना पड़ता है।

इसका सबसे बढ़िया उदाहरण 2006 में केयर्न एनर्जी (Edinburgh, United Kingdom) का अपना ऑपरेशंस वेदांता (वेदान्त रिसोर्सेज लिमिटेड Mumbai, India) को बेच देना है। केयर्न एनर्जी का वेदांता में 9% स्वामित्व होने के बावजूद भारत सरकार ने कोई एडवर्स टैक्स नहीं लिया।

फिर 2012 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने ब्रिटेन की दिग्गज टेलिकॉम कंपनी वोडाफोन से भारत सरकार द्वारा रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स की मांग को ख़ारिज कर दिया गया। वोडाफोन की इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में भारत के खिलाफ केस में जीत हासिल होने के बाद सरकार ने द्वेष की भावना से प्रेरित होकर एक ऐसा कानून बनाया जिसके तहत वह कई साल पहले से कंपनी से टैक्स वसूल सकती थी। यह राज्य की “विवेकाधीन और भेदभावपूर्ण” शक्तियों का एक दुखद इस्तेमाल था।

सन् 2007 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के स्नातक सचिन बंसल और बिनी बंसल द्वारा स्थापित एक ई-कॉमर्स कम्पनी फ्लिपकार्ट जिसका मुख्यालय बंगलौर में स्थित है। सचिन बंसल और बिनी बंसल ने विदेश जाकर अक्टूबर 2011 में फ्लिपकार्ट को सिंगापुर में रजिस्टर करवा लिया ताकि देश के अधपके और रोजाना बदलते रहने वाले कानूनों से बचा जा सके। 09 मई 2018 को अमेरिका की बहुराष्ट्रीय खुदरा कंपनी वॉलमार्ट को फ्लिपकार्ट की 77% हिस्सेदारी साथ ही साउथ अफ्रीका की इंटरनेट और एंटरटेनमेंट कंपनी नैसपर्स ने फ्लिपकार्ट में अपनी कुल 11.18 % हिस्सेदारी वॉलमार्ट के हाथों बेच दिया। इस समय फ्लिपकार्ट वालमार्ट डील से भारत को अच्छा फायदा मिल सकता था मगर FDI से मुनाफे के लालच के चलते फ्लिपकार्ट का सिंगापुर से डील किया गया जिससे 16,36,34,46,00,000.00 रूपये की जगह मात्र 1,48,75,86,00,000.00 रूपये से संतोष करना पड़ा क्यूँकि देश के कानून के कारण सारा पैसा विदेशी कंपनियों के हाथों में चला गया। और इस तरह एक पूर्णतय भारतीय ई-कॉमर्स कम्पनी जिसका पौधा भारत में लगा था फल विदेशी खा रहे हैं और हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते।

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